Sunday, September 5, 2021

Zindagi ke 6 sukh

                        अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रियश्च भार्या प्रियवादिनी च ।
                        वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥


ये है जिंदगी के ६ सुख , अगर हम इसे गौर से समझने की कोशिश करे तो इसका अर्थ और अच्छे से समझ आता है।  आईये कोशिश करे 


अर्थागमो नित्यं :  अर्थ ( पैसा ) का  हर रोज आगमन हो , 

निरोगिता च :  शरीर निरोग हो, कोई शारीरिक मानसिक समस्या नहीं हो 

प्रियश्च भार्या  : पत्नी प्रिय हो 

प्रियवादिनी च : और प्रिय बोलने वाली हो 

वश्यश्च पुत्रो : पुत्र जो हो वो वश में हो 

अर्थकरी च विद्या : ज्ञान ऐसा हो जो फल ( अर्थ ) देने वाला हो 



जी हाँ - तो ये है ६ सुख, जिसको पाने की इच्छा हर मनुष्य को होती है , और हमारा गंतव्य यही होना चाहिए।  ऐसी कोशिश करे 




Sunday, May 17, 2020

Prabhu ShriRam ji ke 10

                                                                      ! जय श्री राम !

रामायण ! हमने कितनी बार सुना , देखा और समझा है
आज आपके समक्ष एक नया पहलू लेके आ रहा हूँ।  यह मैंने एक प्रवचन के दौरान सुना

त्रेतावतार में प्रभु श्रीराम इन ऋषियों से मिले


१ . वशिष्ठ
२ . विश्वामित्र
३.  वाल्मीकि
४.  अगस्त्य
 
५ . परशुराम
६ . शरभंग
७ . सुदिक्षण
८ . अत्रि
९ . भरद्वाज
१० . नारद


इस दौरान प्रभु के १० ही परिकर  ( सेवक ) थे।

१ . लक्ष्मण
२ . हनुमान


३ . केवट
४ . जामवन्त
५ . नल
६ . नील
७ . जटायु
८ . सुग्रीव
९ . अंगद
१० .विभीषण

और प्रभु ने अपने अवतार काल में सिर्फ १० लोगो का वध किया




१. ताड़का
२. सुबाहु
३. मारीच
४. खर
५. दूषण
६. रावण
७. कुम्भकरण
८. त्रिसरा
९ कबंध
१० बाली

यह थे प्रभु के १०. जय श्री राम


Meri Didi

गुनगुनाती चहकती
फूलों से भी सुन्दर मेरी दीदी

गूंजते कानो में आपके हर शब्द
लिस्मानिया डोनावानी (Leishmania donovani) मालूम नहीं क्या है 
पर याद है
हर सुबह शाम आपकी वो आवाज  .. याद है

जनरेटर के बंद होते ही
जहाँ हम दो खुश होते
और आप सोचते
अब कैसे पढूंगी 
अलग थे आप
सब याद आता है
अब सोचता हूँ कब सुनूंगा उस अमीबा को 

गोल नंदन और सुरेश  .. गोली और चपोली
न जाने कितने सारे नाम
सब याद आता है
कभी कभी सोचता हूँ कहाँ है वो ड्राम
जहाँ वो सब छुप गए है
अरे हाँ मेरे स्कूल में है कंही
पर खोज लेंगे अब तो जीपीएस है  ...

और कह के जाता है हर पल ... आप यही तो हो
मेरी हर याद में
मेरी हर बात में
क्योंकि जो भी मैं हूँ सब आप ही से तो सीखा है


Tuesday, November 20, 2018

Happy Anniversary My love


तसव्वुर मेरे साथी का रेत सी जलती इस धरा पे 
मय में मक़सूद एक साजिश और तरसते हम 

उस तमस में फसे है हम और उनकी रूह की वो कशिश 
दिल के गलियारों में खनकती जुदाई की वो खलिश 
खोजा करते थे जो मकाम इस आहट के एहसास से यूँ 
 . . . . . . 



अब कुछ याद नहीं बस आप और 
उस ख्वाब में डूब जाने को दिल करता है। ......... 







Friday, September 14, 2018

Charkhe ki dor

Pirokar us charkhe ki dor ko
Tarasha kiya karte the jis gali ko
Is jaddojahad mein ki hum kahan aur wo kahan
Soone se hai hum aur wo falsapha hai

Nabzon ki sune to khalish si hai kuchh yahan
Aaj unke aankhon mein jo hum aabad hain
Dooriya kah rahi jo us hawa se aaj
Us shaam e khaas ki unki chahakti
 Aawaj hai

Friday, June 10, 2016

LORD KRISHNA STUTI......

Tvamidedeva purusa puranah.. tvamasya vishwasya param nidhanam...
vettasi vedyam cha param cha dhama.. tvaya tatam vishwamanant rupam...

vayuryamogni varuna shashanka .. prajapatistvam prapita mahascha,....
namo namastestu sahasraktitva.. punascha bhuyopi namo namaste...

namah purastadath prishtha taste .. namostu te sarvat ek sarva
anantviryamit vikramastvam sarva samapnosi tatosi sarva !!




तवमदिदेव: पुरुष: पुराण  त्वमस्य विश्वस्य परम निधानं  !
वेत्तासि वेद्यं च परम च धामा त्वया ततम विश्वमनन्त रूपम !!

वायुर्यमग्नि वरुण शशांक। . प्रजपतिस्त्वं प्रापित महश्च  !
नमो नमस्तेस्तु सहस्ता कृत्वम्  पुनश्चा भुयोपि नमो नमस्ते !!

नम : पुरस्तादथ  पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वात एव सर्व
अनन्तवीर्यामित विक्रमस्त्वं सर्व समाप्नोसि ततोषि सर्व !!

Monday, October 12, 2015

Sinhasan khali karo... janta aati hai

Awesome lines by Ramdhari Singh Dinkar...
सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
जनता? हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाड़े-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चूस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।
जनता? हां, लंबी-बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक, मगर, आखिर इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"
मानो, जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में
अथवा कोई दुधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।
लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।
अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता; गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।
सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तैयार करो
अभिषेक आज राजा का नहीं, प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।
आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।
फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।